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✍ये कुछ लाईन का कविता आप सबके लिये✍ 👨‍💻 2020 अब ना जाने का का देखाई ई नाही बुझता,

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अब ई  दूनियाँ के का होई ये वीधाता , दिन पर दिन लोगवा के  रहन बिगरल जाता, अब ई दूनियाँ के का होई ये वीधाता , आईल एगो अइसन विमारी लोगवा के  लोगवा से  टूट गईल नाता, अब ई  दूनियाँ के का होई ये विधाता , बर बुजुर्ग के दिहल संस्कार सभे भुलाईल जाता , अब ई  दूनियाँ के का होई ये वीधाता , केतना लोग  मेहरि के कहाला पर माँई बाप से तुर लिहलन नाता , अब ई  दूनियाँ के का होई ये विधाता , नीम पकरी के पेड़ जऊन गाऊवा में रहे ऊ अब नाही दिखता , अब ई दूनियाँ के का होई ये वीधाता , हमारा त इ विमारी पर्यावरण के काऊनो चैलेंज बुझाता , अब ई दूनियाँ के का होई ये वीधाता , एगो भाई आपना लोभ के चलते भाई के दुशमन बनल जाता , अब ई   दूनियाँ के का होई ये वीधाता , दिन पर दिन गरीब के हक मारल जाता , अब ई  दूनियाँ के का होई ये वीधाता , कोरोना के चलते बंद भईल सारा कंपनी अब ई पुरा दुनियाँ  किसान पर निर्भर भईल ईहे बुझाता , अब ई दूनियाँ के का होई ये विधाता , दूनियाँ के डूबत नईया  जवान,किसान,डॉक्टर बचाई ईहे बुझाता , अब ई दूनियाँ के का होई ये विधाता , 2020 अब ना जाने का क...

रामायण कहानी 1976 में शुरू हुई

फ़िल्म निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर अपनी फिल्म 'चरस' की शूटिंग के लिए स्विट्जरलैंड गए। एक शाम वे पब में बैठे और रेड वाइन ऑर्डर की। वेटर ने वाइन के साथ एक बड़ा सा लकड़ी का बॉक्स टेबल पर रख दिया। रामानंद ने कौतुहल से इस बॉक्स की ओर देखा। वेटर ने शटर हटाया और उसमें रखा टीवी ऑन किया। रामानंद सागर चकित हो गए क्योंकि जीवन मे पहली बार उन्होंने रंगीन टीवी देखा था। इसके पांच मिनट बाद वे निर्णय ले चुके थे कि अब सिनेमा छोड़ देंगे और अब उनका उद्देश्य प्रभु राम, कृष्ण और माँ दुर्गा की कहानियों को टेलेविजन के माध्यम से लोगों को दिखाना होगा। भारत मे टीवी 1959 में शुरू हुआ। तब इसे टेलीविजन इंडिया कहा जाता था। बहुत ही कम लोगों तक इसकी पहुंच थी। 1975 में इसे नया नाम मिला दूरदर्शन। तब तक ये दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता तक सीमित था, जब तक कि 1982 में एशियाड खेलों का प्रसारण सम्पूर्ण देश मे होने लगा था। 1984 में 'बुनियाद' और 'हम लोग' की आशातीत सफलता ने टीवी की लोकप्रियता में और बढ़ोतरी की। इधर रामानंद सागर उत्साह से रामायण की तैयारियां कर रहे थे। लेकिन टीवी में प्रवेश को उनक...